अशरण भावना ~ Unprotectedness ~ 2nd Reflection for Peace & Joy

by on July 7, 2014

We must come to terms with our unprotectedness, known as Asharana Bhavana. As a habit, we keep looking for external protection, for someone to be our saviour. We feel secure when we believe that someone is taking care of us. But this is a false sense of security. Time and again, each one of us faces the truth that what I cannot do for myself nobody will do for me. This reflection gives a new insight – not to be dependent, not to seek the illusion of protection. Below is an extract from “Jeevan ka Utkarsh” by Shri Chitrabhanu, translated into Hindi by Pratibha Jain.
 
Unprotectedness - path to inner peace

असुरक्षा का अहसास हमारे अंदर बचपन से है। अगर माँ चली गई तो बच्चा रोता है। यह स्वाभाविक है। मगर पचास-साठ वर्ष की उम्र के लोग भी बच्चों की तरह रोते हैं जब उनकी माँ चली जाती है। क्यों! क्योंकि उनके अन्दर उस लाचारी का एहसास रहता है। वे अपने पैरों पर खड़े होने के लिए तैयार नहीं है।

एक सच्चे साधक के मन में विचार उभरता है कि मैं हमेशा किसी शरण की – किसी मसीहे की खोज में हूँ। जब कोई मुझे रास्ता दिखाता है या मेरा ध्यान रखता है – तब मेरा मन शांत है। मगर अब मैं जान चुका हूँ कि जो मैं स्वयं के लिए नहीं कर सकता – कोई दूसरा मेरे लिए नहीं करेगा। इस चिंतन से मुझे एक नवीन दृष्टि मिली है – निर्भर नहीं रहने की।

इस तरह की विचारधारा से अंतर्मन में जिस भावना (या अनुप्रेक्षा) का जन्म होता है – वह है अशरण भावना यानी असुरक्षित स्थिति। उसके पार है शरण यानी सुरक्षा। इससे साधक अपनी अशरण अवस्था को पहचानने लगा है। एक-एक करके वह देखता है कि वह जिन वस्तुओं और व्यक्तियों पर निर्भर था – वे सभी अपने आप में लाचार हैं।

साधक को सोचना चाहिए कि मुझे अपनी चेतना को इन अनित्य निर्भरताओं से हटाकर जीवन के पावन प्रवाह के साथ जोड़ना है जो निरंतर है। उस चेतना के साथ जुड़कर मुझे अपना नित्य शरण – अपना आंतरिक संसार मिलेगा।

 
 

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