अनित्य भावना ‍~ Impermanence ~ 1st Reflection for Peace & Joy

by on June 24, 2014

This parable sheds light on the Impermanence of Life, or Anitya Bhavana, as explained by the Jaina seers. The ardent seeker must contemplate upon this truth to grasp life in its myriad changes. An extract from “Jeevan ka Utkarsh” by Shri Chitrabhanu, translated into Hindi by Pratibha Jain.
 
Anitya Bhavana ~ Impermanence of Jainism

सूर्यास्त के समय गुरु और शिष्य बाहर जाकर आसन ग्रहण करते हैं। प्रकृति में लीन हो जाते हैं। वर्षा के मौसम में कितने रंगें के बादल छा जाते हैं। कभी–कभी इंद्रधनुष भी नज़र आता है। गुरु शिष्य से कहते हैं, ‘इस नैसार्गिक सौंदर्य को देखो। इन रंगों की अनुभूति करो। हर बादल में एक आकार को दूँढ़ो। प्रकृति के साथ आत्मसात रहो। बाकी सब कुछ भूल जाओ।’ शिष्य सूर्यास्त के बादल के रंगों और आकारों से परिचित हो जाता है। वह अपनी आँखें मूँदकर उस चित्र को अपने मन की आँखों में समा लेता है। बार–बार अपनी आँखें खोलकर प्रकृति के बदलते हुए दृश्यों को देखता है और फिर से आँखें बंद करके ध्यानमग्न हो जाता है।
 
दो घंटों में अँधेरा छा जाता है। गुरु प्रश्न करते हैं, ‘वत्स, क्या नज़र आ रहा है?’ शिष्य कहता है, ‘मुझे कुछ नजर नहीं आ रहा। सब कुछ चला गया।’ अब गुरु पूछते हैं, ‘कहाँ चले गाए – वे आकार, रंग, बादल, वह सौंदर्य – कहाँ लुप्त हो गए?’ शिष्य चुप्पी में खो जाता है, विचारमग्न हो जाता है। उत्तर का आभास भी है। वह इंद्रधनुष, वह सौंदर्य लुप्त है। मगर फिर भी, गया नहीं है।
 
यही धयान का बिंदु है – सभी कुछ इस जगत में ही विद्यमान है। गुरु शिष्य से कहते हैं, ‘कुछ भी लुप्त नहीं हुआ है, सब कुछ यहीं है। मगर पृथ्वी की परिक्रमा के कारण तुम बदलाव को देखते हो। तुम्हारी भौतिक दुष्टि को ऐसा प्रतीत होता है मानो कुछ चला गया है।’ ‘अब अपनी अंतर्दृष्टि का प्रयोग करो। देखो, संपूर्ण ब्रहांड एक अटूट लय में घुम रहा है। वही सूर्य जिसे हम यहाँ से लुप्त मानते हैं, पृथ्वी के उस पार उदय हो रहा है। सूर्य तो वही है। स्वयं को पृथ्वी के धरातल से उठकर सूर्य की ऊँचाई तक ले चलो। अब तुम्हें सूर्य सदैव दृष्टिगोचर होगा। अपने भीतर के सूर्य से अभिज्ञ रहो, तुम्हारे अंदर अपरिवर्तनशील जीवन है।’

 

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{ 2 comments… read them below or add one }

Aruna June 25, 2014 at 4:37 pm

For some reason I am reminded of a poem I read in Class X after reading this article. It is by Sumitranandan Pant titled मौन निमन्त्रण।
स्तन्ध ज्योत्स्ना में जब सन्सार
चकित रहत शिशु-सा नादान
विश्व के पल्कों पर सुकुमार
विचर्ते हैं जब स्वप्न अजान,

न जाने, नक्षत्रों से कौन
निमन्त्रण देता मुझ्को मौन।

It is as if the nature is calling you to reflect, meditate and assimilate the permanence of impermanence…

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Pratibha Jain June 25, 2014 at 4:48 pm

How beautiful to be reminded of this masterpiece of a poem – thanks Aruna.

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