एकत्व भावना ~ 4th Reflection on Freedom from Dependency

by on July 19, 2020

Below is an extract from “Jeevan ka Utkarsh” by Shri Chitrabhanu, translated into Hindi by Pratibha Jain. Among the twelve reflections of Jainism, the 4th reflection on freedom from dependency teaches us to focus on the soul power of aloneness. Read a very interesting fable of the lion cub to gain an insight into this reflection.
 

एकत्व भावना – निर्भरता से मुक्ति

इस विचार के साथ कार्यरत रहें कि ‘मैं एक हूँ’, ‘मैं एक जैसे आया हूँ’। अब आप समझ जाएँगे कि अपने पैरों पर किस तरह खड़े रहना है। जब आप रोते हैं कि ‘मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता’, ‘मैं इस वस्तु या उस वस्तु के बिना नहीं जी सकता’, तब आँसू आपकी दृष्टि में रुकावट बन जाते हैं। आप उनके बिना जी रहे थे क्योंकि आप अकेले आए थे। उस समय आपको सिर्फ़ साँस की ज़रूरत थी एवं शरीर के पोषण के लिए कुछ भोजन की। आप अब भी उनके बिना जी सकते हैं।
 
जब साधक अकेलेपन पर ध्यान करता है, तब संभव है कि भय रेंगता हुआ आ जाए। ‘मैं अकेला हूँ। क्या इस संसार में कोई भी नहीं है जिसे मैं अपना कह सकूँ?’ शायद ऐसे विचार आने लगे। शायद ये विचार आपको भयभीत करे और आप निराश हो जाएँ।
 
जब ऐसा होता है, तब स्वयं को एक नए ढंग में देखना आवश्यक है। स्वयं को एक व्यक्ति के जैसे, एक जीवन शक्ति के जैसे देखें। ध्यान में अपनी आत्मा की गत्यात्मक, प्रबल वास्तविकता को देखें। जैसे ही आप इस ऊर्जा पर केंद्रित होंगे, आपको अनुभूति होगी कि आप नित्य हैं, अपने भविष्य के रचयिता हैं।
 
प्राचीन ग्रंथों में इस भाव को सिंहवृत्ति कहा जाता है।
 
जंगल का सिंह बड़े झुंड में नहीं चलता। आप चिड़ियाघर में कई सिंहों को एक साथ देख सकते हैं, मगर बीहड़ वन में नहीं। वहाँ हर सिंह के पास अपना डेरा, अपनी माँद, अपना राज्य होता है। एक सिंह अकेला रहना चाहता है। साथ ही उसके ह्रदय में कोई भय नहीं है। वह जानता है कि वह राजा है। ध्यान में यह सिंहत्व उभरना चाहिए। हमें उस निडरता का अनुभव करना चाहिए।
 
एक बार एक सिंह की मौत हो गई और उसका छोटा सा शावक बीहड़ वन में भटक गया। एक गड़ेरिया ने उसे देखा और घर ले गया। उस सिंह-शावक को अपनी भेड़-बकरियों के साथ पालने लगा। वह शावक उनके साथ बढ़ने लगा, दिन प्रतिदिन विशाल और शक्तिशाली बनता गया।
 
एक दिन जब सिंह-शावक सभी भेड़-बकरियों के साथ चर रहा था, तब अचानक एक विशालकाय सिंह उनके चारागाह के ऊपर पहाड़ पर आकर जोर से दहाड़ने लगा। उसकी दहाड़ सुनकर सभी भेड़-बकरियाँ और सिंह-शावक भागने लगे। विशाल सिंह ने सबको भागते हुए देखा और सोचने लगा, ‘हाँ, इन्हें तो भागना ही चाहिए, मगर वह सिंह-शावक क्यों भाग रहा है?’
 
विशाल सिंह उस शावक के पीछे भागा और उसे पकड़ लिया। शावक डर के मारे रेंकने लगा। तब सिंह उसे जल के पास ले जाकर उससे कहने लगा, “तुम क्यों रेंक रहे हो? तुम तो एक सिंह हो! इस जल में अपनी परछाई को देखो और दहाड़ो।” मगर छोटा सा सिंह न तो उसकी बात समझ सका, न ही विश्वास कर सका। वह बचकर घास चरने के लिए जाने लगा।
 
“तुम घास की पत्तियों को क्यों कुतर रहे हो?” विशाल सिंह ने पूछा। “यह तुम्हारा भोजन नहीं है।” मगर सिंह-शावक भय से कांपने लगा।
 
“तुम क्यों काँप रहे हो?” उसने नन्हे शावक से पूछा। “मैं तुम्हारे जैसा हूँ। तुम मेरे जैसे हो। क्या तुम अपना स्वभाव भूल चुके हो?”
 
यह मन इतना कमज़ोर है कि अगर उसने एक रूप अपना लिया है, तब वह अन्य दृष्टिकोण को सहजता से स्वीकार नहीं करता है। वह उसी चौखट में, उसी दिशा में रहता है। हमारा मन इसी तरह स्वयं को सीमित करता है। सिंह-शावक अपने सीमित दृष्टिकोण को छोड़ने के लिए तैयार नहीं था। मगर विशाल सिंह भी उसे समझाने पर आतुर था।
 
“नहीं, समझने का प्रयास करो,” उसने शावक से कहा। “तुम मेरे जैसे हो।”
 
उसने उसे तालाब के जल में देखने के लिए कहा। वह उसके पास खड़ा हुआ और कहने लगा, “देखो, अपनी परछाई देखो। मेरी परछाई देखो। अपने पीले रंग को देखो, अपनी अयाल, अपनी पूँछ को देखो कि कितनी घुँघराली है। देखो, तुम्हारे पैने दाँत एकदम मेरे जैसे हैं। देखो तुम्हारा सिंह सा चेहरा।” शावक देखने और सोचने लगा।
 
“हाँ, मेरा चेहरा सिंह सा बड़ा है। यह सच है। न मैं ऊन से ढका हूँ, न ही मेरे सिर पर सींग है। मगर यह जानवर दहाड़ता है और मैं बा-बा कहता हूँ। यह बहुत गहरा फ़र्क़ है।”
 
“आओ, नन्हे शेर, अपनी आवाज़ को निकालो! तुम्हारा ह्रदय बहुत विशाल है। मैं उसकी धड़कन सुन सकता हूँ, इसलिए अपनी दहाड़ बाहर निकालो!”
 
नन्हे शावक ने ज़रा सी चेष्टा की। उसने अपना कंठ खोला मगर आदत की वजह से उसका स्वर-यंत्र सिकुड़ गया था और वह दहाड़ नहीं सका। धीरे-धीरे उसने कोशिश की और अंत में उसकी सच्ची दहाड़ निकल पड़ी।
 
विशाल सिंह ने उससे कहा, “अब अकेले चलो। झुंड में मत चलो। तुम्हें झुंड से सरोकार नहीं है। वे सब भेड़ और बकरियाँ है। तुम एक सिंह हो। तुम भेड़ और बकरियों के साथ कैसे जी सकते हो? अब वहाँ जाओ और ज़ोर से दहाड़ो!”
 
शावक वहाँ वापस गया और इतनी ज़ोर से दहाड़ा कि सभी भागने लगे – भेड़, बकरियाँ, गड़ेरिया और बाक़ी सभी। उसने अपने स्वभाव को पहचान लिया। वह परिवर्तित हो चुका था। ‘मैं अकेला खड़ा हो सकता हूँ। साथ ही, मैं लाचारी और भय के एहसास के बिना जी सकता हूँ।’
 
इस तरह एकत्व की भावना परिवर्तन लाने वाली भावना है। यह एक नवीन आदर्श स्थापित करता है, आपके मन के लिए एक नवीन दृष्टि। धीरे-धीरे यह एक प्रतीक बन जाता है और आप स्वयं को एक नवीन आयाम के रूप में देखने लगते हैं।
 
‘मैं अकेला आता हूँ एवं अकेला जाता हूँ, मगर मैं अकेला नहीं हूँ। स्वयं में उस एकत्व को जानने के बाद, मैं हर व्यक्ति में उसे देखता हूँ। इसलिए सभी मेरे समान हैं और मैं सभी के समान।’
 

 
 

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