उपाध्याय श्री प्रवीण ऋषि – गुरुदेव के साथ अक्षर यात्रा

by on September 17, 2014

प्रवीण ऋषि – उपाध्याय प्रवर
हिमालय की चोटी पर उनकी नज़र स्थिर थी। जाना था वहीं, उन बर्फीली वादियों में जहाँ सदियों से कई साधकों ने सत्य की अनुभूति पाई थी। विदा के शब्द कहे जा चुके थे, रास्ता तय हो चुका था। अचानक अंतर्मन में गुरु का आदेश मिला जिसने जीवनयात्रा को बदल दिया। आदेश था या मंत्र, पता नहीं। गुरु के प्रति मन में समर्पण भाव ने सारा स्थान घेर रखा था। वहाँ न प्रश्न के लिए कोई कण बचा था न विकल्प के लिए। गुरु की आज्ञा शिरोधार्य की और उनकी छवि अपने अंतर्मन में बसाकर वे चल पड़े जग में करुणा भाव बरसाने, एक आध्यात्मिक क्रांति के उद्घोष के लिए।

 

उपाध्याय श्री प्रवीण ऋषि। आचार्य सम्राट 1008 श्री आनंद ऋषिजी के शिष्य। एक जैन मुनि, एक सुनियोजित विचारक, एक प्रबुद्ध वक्ता, एक आत्मावलम्बी साधक, प्रकृति के अनन्य उपासक। जन्म महाराष्ट्र 1957, दीक्षा 1974 – बचपन की अदम्य शरारत और युवापन का बेचैन विद्रोह, इन दोनों के पीछे जो प्रखर मनस्वी था, उसे गुरु ने एक झलक में पहचान लिया। उसके बाद ज्ञान और साधना के पथ पर जीवन की जो दिशा शुरू हुई, उसका विवरण अपने आप में मंत्रमुग्ध कर देता है। कठोर तपस्या, चातुर्मास में अनेकानेक विषयों पर सफल शिविर, तेरह महीनों तक इंदौर के निकट एक पहाड़ी पर एकांत साधना, आगम वाचन और अनेक संघोपयोगी कार्य – कहाँ शुरू करें?

प्रवीण ऋषि

 

मगर इस दीर्घ पथ पर चलने के बजाय चलिए उस छोटी सी पगडंडी पर जहाँ वे हमारे साथ हैं, हमारे सुख-दु:ख में, हमारी लड़खड़ाती सोच में, हमारी बिखरती भावनाओं में, हमारी नैतिक असमंजसताओं में। इन सब विषयों में वे किसी सक्षम मनोवैज्ञानिक से कम नहीं। हमारे अंतर्मन के जिन लुके छिपे कोनों को हमने कभी पहचाना ही नहीं है, वे सभी किसी घर के भेदी समान उनके सामने पारदर्शी बनकर खड़े हो जाते हैं।

 

आगम के शब्द भी मानो उनके साथ वैसा ही रिश्ता निभाते हैं। उन सूत्र ग्रंथों का जिस आह्लाद के साथ आप विवेचन करते हैं, जिस तरह आप उनके कार्य-कारण भाव को सुनियोजित करते हैं, उनके आयामों का अन्वेषण एवं अनुसंधान करते हुए संसार के समक्ष ऐसे सशक्त प्रयोग रखते हैं, वैसा कार्य सिर्फ एक वैज्ञानिक ही कर सकता है।
ऐसे हैं गुरुदेव – एक विचारक-वैज्ञानिक-मनोवैज्ञानिक-दार्शनिक-धर्मगुरु, मगर इन सबसे ज़्यादा अगर कोई शब्द है जो उनका सही वर्णन कर सकता है, तो वह है ‘धार्मिक-पुनर्व्याख्याता’ जिसे अंग्रेजी में hermeneutician कहा जाता है।
इसका प्रथम एहसास मुझे तब हुआ जब उन्होंने एक प्रवचन में कहा, ‘धर्म, कर्म और रिश्ते – इन तीन में से किसी को चुनना है तो रिश्तों को चुनिए।’ पहले कुछ अटपटा लगा, फिर आश्चर्य हुआ। संतों के मुख से ऐसे शब्द सुनना एक अपूर्व एहसास था। मगर जैसे-जैसे उनकी वाणी सुनते गए और इन शब्दों का अर्थ समझ में आने लगा, मन में अहोभाव छा गया। सच ही तो कह रहे थे गुरुदेव, रिश्तों को चुनने के लिए जो साधना करनी है, उसमें धर्म और कर्म सहज ही निहित हो जाएँगे।

 

अर्हम्‌ गर्भसाधना भी उनके इसी क्रांतिकारी स्वरूप और धर्म-वैज्ञानिकता की प्रस्तुति है, वर्षों की अथक साधना का परिणाम। हजारों की तादाद में लोग इससे जुड़े हुए हैं, बहुत सफल प्रयोग हुए हैं। विषय इतना विस्तृत है और इसके बारे में गुरुदेव का ज्ञान इतना गहरा है कि इन पन्नों को एक प्रथम भूमिका ही मानकर चलना चाहिए। यह तो बस एक स्वागत गान है हर उस दंपति के लिए, हर उस परिवार के लिए जहाँ भावी संतति के सपने उजास हैं।

 

वह वक्त आ गया है जब धर्म और जीवन को साथ चलने के लिए कुछ नए आयामों को सशक्त रूप से स्वीकार करना होगा। जीवन के हर दायरे में, जन्म से मरण तक के हर पड़ाव में हमें धर्म से जुड़ना होगा, धर्म को जोड़ना होगा। और यह तभी संभव है जब हमारे धर्मगुरु जीवनगुरु बनना चाहेंगे। जो प्रतिक्षण ज्ञान की उपासना में रत हैं, अगर वे हमारे बच्चों को आदर्श विद्यार्थी बनना नहीं सिखाएँगे तो और कौन सिखाएगा? जो स्वयं के अंदर परमात्मा से एक अलौकिक रिश्ता जोड़कर हर पल उस रिश्ते की साधना करते हैं, वे अगर हमें रिश्ते निभाना नहीं सिखाएँगे, तो और कौन सिखाएगा? रिश्ता रिश्ता होता है, लौकिक हो या अलौकिक। आज यहाँ ईमानदारी से जुड़ेंगे तो कल वहाँ भी सहज में जुड़ पाएँगे। अगर ऐसा नहीं करेंगे तो हमारे पारिवारिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक धरातल और भी खोखले होते जाएँगे, परिस्थिति और भी बिगड़ती जाएगी।

SRI_7820

इसलिए गुरुदेव प्रवीण ऋषि के इस गर्भसाधना अभियान से मेरा मन हर्षित है। जिन्होंने अपना सर्वस्व जन्म और मरण के रहस्य को समझने में न्यौछावर कर दिया है, उनसे अधिक जन्म की प्रक्रिया को कौन जान सकता है? इस विषय में उनकी सोच को, उनके अनुसंधान को, उनके आविष्कार को, उनके प्रयोगों को लिखित शब्दों में ढालने का जो अवसर मुझे मिला, वह मेरे जीवन का एक असामान्य पन्ना है, एक स्वर्णिम पड़ाव, एक अद्वितिय अनुभूति। गुरुदेव इसे अक्षर यात्रा कहते हैं, मगर मेरे लिए यह एक अंतर्जीवन यात्रा रही है, मानो जीवन में निहित एक और जीवन! मेरे सहस्र आभार!

 

Share...Google+Pin on PinterestShare on LinkedInTweet about this on TwitterShare on Facebookshare on Tumblr

Leave a Comment

Previous post:

Next post: